ये काली रात गुज़रने को है
बस थोड़ी देर और ठहर।
सूरज बस निकलने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
माना के राह कठिन थी,
छाले भी पड़े पांवों में।
थक के तू चूर हुआ,
कांटे मिले छावों में।
सफर ये अब सिमटने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
प्यास से सूख गए अधर,
भूख से व्याकुल शरीर हुआ।
बाणों की शय्या बना यह काल,
समय अभेद्य प्राचीर हुआ।
गंगाजल बस निकलने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
~ आनंद मोहन श्रीवास्तव
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