गर सियाह अंधेरे हैं,
तो उजली रातें भी होंगी।
आज तपिश का जो मौसम है,
कल यक़ीनन बरसातें भी होंगी।
हाथ जो खाली खाली हैं,
मुट्ठी में फिर सौगातें भी होंगी।
माना के आज तनहाइयाँ हैं,
कल यारों की जमातें भी होंगी।।
तूफान में हाथ थामा है किसी ने,
कुछ जानों की सलामती इस नाते भी होंगी।।
आपस में बस बातें करते रहो दोस्तों,
जल्द ही अपनी मुलाक़ातें भी होंगी।।
~ आनंद मोहन श्रीवास्तव
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