तनहाइयों ने घेरा था,
उनके ख़याल सता रहे।
डूब ही जाता शायद मैं,
पर यार पुराने, हंसा गये।।
तनहाइयों ने घेरा था,
उनके ख़याल सता रहे।
डूब ही जाता शायद मैं,
पर यार पुराने, हंसा गये।।
इतना भी मुश्किल नही समझना,
जज़्बातों की बारीकियों को।
बस नज़रों से नापना छोड़िये,
दिल की नज़दीकियों को।।
गर सियाह अंधेरे हैं,
तो उजली रातें भी होंगी।
आज तपिश का जो मौसम है,
कल यक़ीनन बरसातें भी होंगी।
हाथ जो खाली खाली हैं,
मुट्ठी में फिर सौगातें भी होंगी।
माना के आज तनहाइयाँ हैं,
कल यारों की जमातें भी होंगी।।
तूफान में हाथ थामा है किसी ने,
कुछ जानों की सलामती इस नाते भी होंगी।।
आपस में बस बातें करते रहो दोस्तों,
जल्द ही अपनी मुलाक़ातें भी होंगी।।
~ आनंद मोहन श्रीवास्तव
ये काली रात गुज़रने को है
बस थोड़ी देर और ठहर।
सूरज बस निकलने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
माना के राह कठिन थी,
छाले भी पड़े पांवों में।
थक के तू चूर हुआ,
कांटे मिले छावों में।
सफर ये अब सिमटने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
प्यास से सूख गए अधर,
भूख से व्याकुल शरीर हुआ।
बाणों की शय्या बना यह काल,
समय अभेद्य प्राचीर हुआ।
गंगाजल बस निकलने को है,
बस थोड़ी देर और ठहर।।
~ आनंद मोहन श्रीवास्तव
नगमे गूंगे हो गए मेरे,
हर ग़ज़ल बेआवाज़ हो गयी।
नींदें भी चली गयीं आँखों से,
जब से तेरी झलक,
बन्द पलकों की मोहताज हो गयी।